अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।।६८।।
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अ कार के यजन से कभी खत्म न हो ऐसे रूप से रचा हुआ कुंभ (गोला यानी ओ कार जो औ से अलग हुआ हे वह) विशिष्ठ रुप से शुद्ध आत्मा का भी विशिष्ठ रुप में सशोधन बाद अतिक्रम से जुडा होता हे।
कृष्ण का पुत्र प्रद्युम्न, प्रद्युम्न का आगे का अमित क्रम अनिरुद्ध.. लेकिन वह अ कार यानी कृष्ण के विरुद्ध नही हे, लेकिन वह जो दूसरे कहते हे की वह अ कार हमारा हे (यानी अ+नि) वह उससे रुद्ध होकर अपने लोगों को पहचानता है, इसे ऐसे प्रेषित गाढ़ गहन रूप से किया है। प्रतिरथ वह अनिरुद्ध, कृष्ण के खिलाफ नही हे, वह दूसरे कुल के अ कार की ईच्छा के विरुद्ध हे। भेद अभेद्य था, लेकिन जहा सत्य हे वहां धर्म की चर्चा नही और धर्म हे ही, तो सत्य से परे नहीं।
ઓખાહરણ ઘણાં ને ખબર હશે. એકદાંડી મહેલ ની જ વાત અને માળિયું!!!
Jay Gurudev Dattatreya
Jay HIND
Jigaram Jaigishya is a jigar:
જીગર ગૌરાંગભાઈ મહેતા ના પ્રણામ
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