Thursday, January 25, 2024

क्षेत्रपाल स्तुति

क्षेत्रपाल को यज्ञ का Administrative executive, Administrator भी कहते है। सरल उदाहरण के तौर पर जब विश्वमित्र ने यज्ञ किया था, तब राम और लक्ष्मण ने यज्ञ को ताड़का से बचाया था और सुबाहु को गिराया था और मारीच को दूर भगाया था। तो उसे यज्ञ में हम राम और लक्ष्मण को क्षेत्रपाल कह सकते हैं।


पूर्ण क्षेत्रपाल स्तुति


यं यं यं यक्ष-रूपं दश-दिशि-वदनं भूमि-कम्पाय-मानम्।
सं सं सं संहार-मूर्ति शिर-मुकुट-जटा-जूट-चन्द्र-बिम्बम्।।
दं दं दं दीर्घ-कायं विकृत-नख-मुखं ऊर्ध्व-रोम-करालं।
पं पं पं पाप-नाशं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥१॥

रं रं रं रक्त-वर्णं कट-कटि-तनुं तीक्ष्ण-दंष्ट्रा-करालम् ।
घं घं घं घोष घोषं घघ-घघ-घटितं घर्घरा-घोर-नादं ॥
कं कं कं काल-रूपं धिग-धिग-धृगितं ज्वालित-काम-देहं ।
दं दं दं दिव्य-देहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥२॥

लं लं लं लम्ब-दन्तं लल-लल-लुलितं दीर्घ-जिह्वा-करालं।
धू धू धू धूम्र-वर्णं स्फुट-विकृत-मुखं भासुरं भीम-रूपं ॥
रुं रुं रुं रुण्ड-मालं रुधिर-मय-मुखं ताम्र-नेत्रं विशालं।
नं नं नं नग्न-रूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥३॥

वं वं वं वायु-वेगं प्रलय-परिमितं ब्रह्म-रूपं-स्वरूपम्।
खं खं खं खङ्ग-हस्तं त्रिभुवननिलयं भास्करं भीमरूपं ॥
चं चं चं चालयन्तं चल-चल-चलितं चालितं भूत-चक्रं ।
मं मं मं माया-रूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥४॥

शं शं शं शङ्ख-हस्तं शशि-कर-धवलं यक्ष-सम्पूर्ण-तेजं।
मं मं मं माय-मायं कुलमकुल-कुलं मन्त्र-मूर्ति स्व-तत्वं ॥
भं भं भं भूत-नाथं किल-किलित-वचश्चारु-जिह्वालुलंतं ।
अं अं अं अंतरिक्षं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥५॥

खं खं खं खङ्ग-भेदं विषममृत-मयं काल-कालांधकारं ।
क्षीं क्षीं क्षीं क्षिप्र-वेगं दह दह दहनं गर्वितं भूमि-कम्पं ॥
शं शं शं शान्त-रूपं सकल-शुभ-करं देल-गन्धर्व-रूपं ।
बं बं बं बाल-लीलां प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥६॥

सं सं सं सिद्धि-योगं सकल-गुण-मयं देव-देव-प्रसन्नम्।
पं पं पं पद्म-नाभं हरि-हर वरदं चन्द्र-सूर्याग्नि-नेत्रं ।।
रों रों रों रुद्र रुपं।
जं जं जं यक्ष-नागं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥७॥

हं हं हं हस-घोषं हसित-कहकहा-राव-रुद्राट्टहासम्।
यं यं यं यक्ष-सुप्तं शिर-कनक-महाबद्-खट्वाङ्गनाशं ।।
रं रं रं रङ्ग-रङ्ग-प्रहसित-वदनं पिङ्गकस्याश्मशानं।
सं सं सं सिद्धि-नाथं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥८॥

॥ फल-श्रुति ॥

एवं यो भाव-युक्तं पठति च यतः भैरवास्याष्टकं हि ।
निर्विघ्नं दुःख-नाशं असुर-भय-हर शाकिनीनां विनाशः ॥
दस्युर्न-व्याघ्र-सर्पः घृति विहसि सदा राजशस्त्रोस्तथाज्ञातं ।
सर्वे नश्यन्ति दूराद् ग्रह-गण-विषमाश्चेति तांश्चेष्टसिद्धिः ॥

यज्ञ करते समय जिस भी सत तत्व को देव देवी के तौर पर हम बुलाते हैं उनको एडमिनिस्ट्रेशन के हिसाब से उनको बिठाना उनकी सरभरा करना और जो हमारे यहां आगे से है, वह उनके मुंह ना लगे, उसके साथ अच्छा बर्ताव करें, अनिष्ट रोक, उसे सभी की जानकारी हेतु जो एक बंदा होता है, उसे क्षेत्रपाल कहते हैं।

यज्ञयाग आदि कर्म में क्षेत्रपाल को बुलाते भी है, जो पुराना है उसे पूजन भी करते हैं, और जब यज्ञ निपट जाए, तो उसके बाद उसको पूर्ण तरीके से बिदा भी करते हैं। और उसके कुछ श्लोक होते हैं, जो बोलने से वह कार्य होता है। पुरोहित हमें समझा देता है कि क्षेत्रपाल जो पुराना था उसको डेवलप किया, नया तौर तरीका सिखाया, जो देवगण आदि आए, वह उसको संभालेगा और यज्ञ कर्म निपट ने के बाद, हम उसकी विदाई भी कर सकते हैं। द्वाराण उसको भोग भी धराते है। ऐसे बात यज्ञ याग आदि कर्म में पुरोहित आचार्य कहते हैं और समझाते भी हैं।
जय गुरुदेव दत्तात्रेय
जय हिंद
जिगर गौरांगभाई महेता
પ્રણામ 

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