या रहीम या करीम
इस्लामीक धर्म के अंदर यह शीर्षक प्रार्थना का है ।
जब प्रार्थना होती है तो भगवान को प्रार्थना करते समय उसे बड़ी विनंती के साथ उच्चारण करने का प्रावधान है। जिसका अग्नि पुराण के एकाक्षर कोष के प्रकरण से अगर संधि मुलाक्षर से विचार विस्तार करें तो:
या रह ईम : यानी यातो (यजन से) मुझे (में) बालक गिन (हूं)
या कर ईम : यानी यातो (यजन से) यह (मेरे साथ वाला) बालक गिन(है)
अल्लाह को कुदरत के साथ गीना हे, जिसकी वजह से जो "अ" कार रूपी समय से हमारे समय के साथ हमसे जुडा है उसको अच्छे कर्म से कृत्य को निखार ने की बात का प्रावधान हे। यही दत्तात्रेय का भी प्रावधान है।
"ईम" यानी इच्छा वाला अं (अम) पूर्ण शारीरिक संरचना।
जबकि हिंदू धर्म में क्षमापन वृत्ति श्लोक याजन मंत्र नीचे दिया हे।
(जाप/श्लोक/ मंत्र)
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव! परिपूर्ण तदस्तु मे॥
अर्थ – हे प्रभु, मैं आपका आवाहन करना नहीं जानता हूं, ना ही विदा करना जानता हूं। पूजा के विधि-विधान भी मुझे नहीं मालूम हैं। कृपा करके मुझे क्षमा करें। मुझे मंत्र याद नहीं हैं और ना ही पूजा की क्रिया मालूम है। मैं तो ठीक से भक्ति करना भी नहीं जानता। फिर भी मेरी बुद्धि के अनुसार पूरे मन से पूजा कर रहा हूं, कृपया इस पूजा में हुई जानी-अनजानी गलतियों के लिए क्षमा करें। इस पूजा को पूर्ण और सफल करें।
Why British people ruled over India… The Brahman people certainly said these Sanskrit shlok for yaachak.. as himself count as acharya…
“हिन ” यानी गिरा हुआ नहीं बल्कि कोई चीज या वस्तु के बगैर रहना या रखा हुआ। “अ”ज्ञान वाला जो ज्ञान से अज्ञात है ऐसा। यानी उसके पास जो ज्ञान हे वह कही तक सीमित है ऐसे।
और अगर उसके साथ “द” जो ब्रह्मा का दिया हुआ प्रथम शब्दाक्षर कहे तो बनता है “हिन्द”। वह हीन द से नहीं लेकिन हिंद या हींद से परिपक्व हुआ। और संस्कृत की मातृका अग्निपुराण एकाक्षर कोश के तहत छोटी या हस्व इ यानी छोटी इच्छा के साथ स्वर पूर्ण यानी देवत्व के साथ का “द” । और बड़ी ई यानी बड़ी इच्छा।
लेकिन कोई भी हो जो अच्छा करना चाहता है जो अज्ञान से वाकिफ है उसे राह दिखाने की क्षमता रखने वाले उसे “द” कह कर प्रावधानित कर सकते है। ऐसे।
हीम या हिम से ठंडा या ठंड की बात होती है तो वह सार्थक नहीं होती क्यों की गर्भ हमेशा गर्म होता है।
इसी तरह अनुस्वार से “न” यानी हमारे यजन वाला की बात की पुष्टि होती है।
“ह” यानी क्षेत्र में संभाला हुआ य संभालने के लिए या संभालके रखा हुआ “ब्रह्म” का मूल आधारभूत अक्षर “ह”।
अब अगर हिंद या हींद समझे तो
स्वच्छ इच्छा वाला हमारे यजन से संभाला हुआ “द”
आज लोग हिंद और हिंदुत्व को कहां के जा रहे है?
त्व यानी तुम, आप ऐसे अर्थ से हे यानी हिंदुत्व यानी "तुम हिंदु हो" ऐसे।
अंग्रेजो को/ने छोड़ा तो गलत रूढ़ियों को अपने पर आरूढ़ क्यों करते हे?
क्योंकि अंग्रेजो ने सभी भारतीयों की मातृक पैतृक भाषा संस्कृत पर अंग्रेजी की 26 अक्षरों की मुहर लगाना चाहा और हम आज बच्चों को क्षेत्रीय भाषा को छोड़ अंग्रेजी मीडियम में रखना चाहते है???
क्योंकि इकोनॉमी डॉलर पाउंड यूरो भी अच्छी है लेकिन मैं पूरे विश्व में भारतीय रुपया ऊपर चाहता हू!!
दोबारा पढ़े
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
अर्थ :
मुझे मंत्र याद नहीं हैं (में बगैर मंत्र सिद्धि हूं, में बगैर क्रिया वाला हूं, में भक्ति भी नहीं जानता या भक्ति के बगैर हूं। और जैसा हूं वैसा जनार्दन यानी (जन: + द +न) लोगों से निम्न लेकिन सात्विक कर्म को यजन करने वाला हूं, लोगों से गीना या चुना हुआ "द"।
यत्पूजितं मया देव! परिपूर्ण तदस्तु मे॥
यत पूजित मय अ देव!
यहां अ कार रूपी देव के मय (जो अभ्युदय de सकता है) को आज अपनी समजने से पूर्ण पूजन के फल स्वरूप को चाहता हूं।
इसी लिए में अपनी हर बात में भारत की आर्थिक उन्नति चाहता हूं और जो भी जितना भी फ़रवरी 2014 के बाद समझ में आया वैसे ब्लॉग्स या लिखाई य जैसे भी बात करने का मौका मिला , अपनी रजुआत में भारत की आर्थिक उन्नति ही चही है।
इस विशेष विचार को सर्वाधिक प्रणाम
हिन से हीन या हीं नहीं पर हिं से हिन्द और हिंदुत्व, एक कल्पना
जय गुरुदेव दत्तात्रेय
जय हिंद
जिगरम जैगीष्य जिगर:
જીગર ગૌરાંગભાઈ મહેતાના પ્રણામ
શનિ ની વક્ર દૃષ્ટિ સત્ય ની સાતત્યતા કેળવવાની બુધ્ધિ આપી શકે છે. સમજી ને જ વન્દ્દન અને પ્રણામ..
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