रामकृष्ण परमहंस:
... रामकृष्ण एक बहुत प्रगाढ़ चेतना थे और एक बहुत अद्भुत व्यक्ति थे। कई मायनों में, वे सभी सीमाओं से परे थे, लेकिन भोजन को लेकर वे बस पागल रहते थे। वे शिष्यों की मंडली के साथ बातें करते-करते कहते, "रुको"। उसके बाद वे रसोई में जाकर अपनी पत्नी शारदा से पूछते, "आज क्या बन रहा है?" वह इतनी लज्जित हो जाती, यह आदमी भगवान की तरह है, हर व्यक्ति इनकी पूजा करता है, लेकिन ये भोजन को लेकर इतने बावले रहते हैं। सभी धर्मग्रन्थ तुमसे कहते हैं कि अगर तुम आध्यात्मिक हो रहे हो, तो तुम्हें भोजन में कोई आसक्ति नहीं होनी चाहिए, है कि नहीं? यहाँ एक आदमी है, जिसकी पूजा ईश्वर के रूप में की जाती है और यह आदमी भोजन को लेकर पागल रहता है। उन्होंने रामकृष्ण से कई बार पूछा, लेकिन वे उत्तर देना बस टाल जाते थे। हर रोज़ शारदा थाली में उनको भोजन परोसती थी ओर वे हमेशा झूले में बैठकर खाते थे।
एक दिन शारदा को बहुत बुरा लगा और वे उनसे बोली, आपके व्यवहार को देखकर मुझे शर्म आती है। आप भोजन को लेकर इतने पागल क्यों हैं? वे लोग जो आकर आपके सामने बैठते हैं, वे भोजन के बारे में नहीं सोचते। वे बिना भोजन के ही यहाँ बैठने को राजी हैं, लेकिन आप भोजन को लेकर इतन बावले हैं, ऐसा क्यों?"
तब उन्होंने कहा, "शारदा, जिस दिन तुम मेरे पास थाली लेकर आओगी और अगर मैंने उसमें कोई रुचि नहीं दिखाई, तो समझ जाना कि मेरे अब केवल तीन दिन ही बचे हुए हैं। सात वर्षों के बाद, उनके उस नियमित स्थान, झूले पर, जब शारदा उनके लिए थाली परोसकर लाई तो रामकृष्ण ने भोजन में कोई रुचि नहीं दिखायी, उन्होंने अपना मुँह फेर लिया। फिर वे जान गई। कि अब समय आ गया है, और वो विलाप करने लगीं। रामकृष्ण ने कहा, "अब रोने से कोई फायदा नहीं हैं, अब समय आ गया है।" एक दिन हर व्यक्ति का समय आ ही जाता है। कर्म बुनने का उनका यही तरीका था भोजन के लिए एक सचेतन कामना पैदा करना। हर वक्त भोजन की कामना करना, चेतनापूर्वक और जानबूझकर। बिना इस कामना के वे अपने शरीर में बने रहने में सक्षम नहीं थे।
Reference book: Sadguru, Divya darshi ki aankh dekhi
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