आज का मुद्दा थोड़ा अलग है। यह फिलहाल के सापेक्ष वाद से जो लोग वास्ता नहीं रखते, उनके लिए अष्टावक्र गीता का प्रावधान करके कुछ समझाने की बात मेरी तरफ से रजुआत की गई है।
अष्टावक्र गीता और सातत्य प्रमाण का सापेक्ष वाद
आइंस्ताईन का सापेक्ष वाद बहुत कुछ कह जाता है अगर हम समझे अष्टावक्र गीता का २० अध्याय जिसे "क्व" शब्द के प्रावधान के रूप से नवाजा गया है और
"क्व" यानी कौन?
कल सोसाइटी के अंदर शाम को मैं टहलने निकला और जो छोटी बच्ची थी उसको मैंने कुछ नहीं कहा लेकिन उससे थोड़ा एक बड़ा बच्चा था उसे बुलाया "यू आर चाइल्ड।" तो छोटी बच्ची की मां के मुंह से जो निकला वह मैं बोलना नहीं चाहता या लिखना नहीं चाहता, लेकिन मैं अधूरा या आधा कुछ क्षण के लिए हतप्रभ हो गया और तभी मैं निश्चय किया कि मैं इस पर कुछ करूंगा। और यह लिखा।
जो लोग शून्य की फैक्ट्री में होते हैं उनको सापेक्ष वाद की अहमियत पता नहीं है। लेकिन अगर इसे इस उदाहरण से समझे तो बहुत ही अच्छा रहेगा।
हम बांध घर में हैं और बाहर गीला हुआ है। और हमें कुछ पता नहीं है कि क्या हो रहा है।
लेकिन भीनी मिट्टी की खुशबू आती ही है तो पता चलता हे की बाहर गिला हुआ होगा। जब बाहर जाते हैं तो पता चलता है कि गीला हुआ है। तो हम शायद उसे कहेंगे कि किसीने पानी डाला है। लेकिन थोड़ा और आगे जाएंगे और सब कुछ गिला होगा तो हम यह पता कर सकते हैं कि शायद पानी किसी ने नहीं डाला है। लेकिन बारिश हुई है।
या तो कोई हमें आकर कहेगा कि बाहर बारिश हुई और हम उसकी सत्यता का प्रमाण चेक करने के लिए जाएंगे तो पता चलेगा। और यही सापेक्षता का प्रमाण है। और यही अष्टावक्र गीता का मुख्य प्रावधान है कि कुछ तो आगे जिंदगी बड़ी है उसको समझो जो कुछ हुआ है वह जो कोई कह रहा है वह कहीं पर सत्य है उसे स्वीकार करो।
यहां सत्य रूप से आदर्श परिस्थितियों की बात है किसी को उल्लू बनाने की बात नहीं है।
यह बात शाहीबाग और शाहपुर दोनों कनेक्शन को लगती है, जुड़ी हुई।
जिस सत्य को समय पर ना बताया जाए तो बहुत सत्य फिर झूठ हो जाता है।
सत्य से अवगत के बाद भी उसका स्वीकार कौन करेगा, कौन नहीं करेगा, उसकी तोड़ जोड़ में अगर हम खुद को रखते हैं, तो फिर मेरे जैसी हालत हो जाती है।
कुछ बाकी हे.. जो यह पढ़ने से पता चलेगा।
अष्टावक्र गीता अध्याय 20
I tried my level best for not making mistake but it's done
please consider as "Janak uvaach"
प्रार्थना
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः ।
शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः ।
शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
नमो ब्रह्मणे ।
नमस्ते वायो ।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ।
ऋतं वदिष्यामि ।
सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु ।
तद्वक्तारमवतु ।
अवतु माम् ।
अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
अष्टावक्र गीता (संस्कृत)
अध्याय २०
जनक उवाच -
क्व भूतानि क्व देहो वा
क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः।
क्व शून्यं क्व च नैराश्यं
मत्स्वरूपे निरंजने॥२०-१॥
क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं
क्व वा निर्विषयं मनः।
क्व तृप्तिः क्व वितृष्णत्वं
गतद्वन्द्वस्य मे सदा॥२०- २॥
क्व विद्या क्व च वाविद्या
क्वाहं क्वेदं मम क्व वा।
क्व बन्ध क्व च वा मोक्षः
स्वरूपस्य क्व रूपिता॥२०- ३॥
क्व प्रारब्धानि कर्माणि
जीवन्मुक्तिरपि क्व वा।
क्व तद् विदेहकैवल्यं
निर्विशेषस्य सर्वदा॥२०- ४॥
क्व कर्ता क्व च वा भोक्ता
निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा।
क्वापरोक्षं फलं वा क्व
निःस्वभावस्य मे सदा॥२०- ५॥
क्व लोकं क्व मुमुक्षुर्वा
क्व योगी ज्ञानवान् क्व वा।
क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः
स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥२०- ६॥
क्व सृष्टिः क्व च संहारः
क्व साध्यं क्व च साधनं।
क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा
स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥२०- ७॥
क्व प्रमाता प्रमाणं वा
क्व प्रमेयं क्व च प्रमा।
क्व किंचित् क्व न किंचिद्
वा सर्वदा विमलस्य मे॥२०- ८॥
क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं
क्व निर्बोधः क्व मूढता।
क्व हर्षः क्व विषादो वा
सर्वदा निष्क्रियस्य मे॥२०- ९॥
क्व चैष व्यवहारो वा
क्व च सा परमार्थता।
क्व सुखं क्व च वा दुखं
निर्विमर्शस्य मे सदा॥२०- १०॥
क्व माया क्व च संसारः
क्व प्रीतिर्विरतिः क्व वा।
क्व जीवः क्व च तद्ब्रह्म
सर्वदा विमलस्य मे॥२०- ११॥
क्व प्रवृत्तिर्निर्वृत्तिर्वा
क्व मुक्तिः क्व च बन्धनं।
कूटस्थनिर्विभागस्य
स्वस्थस्य मम सर्वदा॥२०- १२॥
क्वोपदेशः क्व वा शास्त्रं
क्व शिष्यः क्व च वा गुरुः।
क्व चास्ति पुरुषार्थो वा
निरुपाधेः शिवस्य मे॥२०- १३॥
क्व चास्ति क्व च वा नास्ति
क्वास्ति चैकं क्व च द्वयं।
बहुनात्र किमुक्तेन
किंचिन्नोत्तिष्ठते मम॥२०- १४॥
ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते,
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते।।
ॐ शांति: शांति: शांतिः ।।
Jay gurudev Dattatreya
जय हिंद जय भारत
જીગર ગૌરાંગભાઈ મહેતા
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