एक सत्य और जानिए।
इंसान insane नही व्यापित ज्ञानसे
जैसे कैसे?
सत्य को जानना और महसूस करना दोनों में कितना अंतर है, समझा जाए तो, जिंदगी अच्छी रहती है। "थद/थड" को अगर पानी मिले तो उसको भी राहत मिलती है। लेकिन अंदर से यानी भीतर से शुद्ध होने की जगह जगह की रीत अलग होती है।
वजू की समय कुगला करना, हाथ पैर धोना शायद भीतर से शुद्धि की रीत रसम कहलाती है।
हिंदू में बाथरूम में नहाने के बाद ही शुद्धि नही होती लेकिन जब भी पूजा, यज्ञ, जाग कार्य होता हे, आचमनी से पानी पीके, पानी से हाथ तो धोने ही पड़ते हे। जिसे बाहर की शुद्धि कहते है।
मुसलमान एवं हिंदू की शुद्धि की रीत अजीब हे। जब माला फिराते हे, मुसलमान अंदर के अवगुण बाहर निकालते हे, हिंदू बाहर के अच्छे गुण अंदर भीतर की ओर समेट लेते है।
मस्जिद के गुंबज के ऊपर का चंद्र ही हिंदू के बीज मंत्र का प्रावधान हे।
कबीर को सब लोग साई बाबा की तरह ही पूजते हे।
मंदिर के पीछे का गोख ही अल्लाह का यानी मरूत यानी पवन के देवता का प्रावधान हे।
हिंदू का ह हो या मुसलमान का म आखिर में तो "हम" सभी लोग "हेम" हो जाते है। (हेम यानी ठंडा)
तू हिंदू न बनेगा, न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा।
जय गुरुदेव दत्तात्रेय
जय हिंद
जिगर गौरांगभाई महेता
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