Wednesday, August 28, 2024

મૃત્યુ એટલેકે જાગીને જવું

મનવા મણ જાગીને જા.
એમનેમ તો ઘણાં ગયા,
પણ તું જાગીને જાય છે.

ગમેતેવો ગીરી પ્રબળ,
વહેતા તોયમ જેવો તું,
વાદળ થી જાગીને જાય છે.

કાયાગ્નિ વિહવળ છે અને 
કૃતાન્ન અગ્નિ ના બની જાતે,
પરમ ધિષણી થઈ ક્રવ્યાદાગ્નિથી,

પરમ વીજળી સાનિધ્યે,
સૂર્ય સહસ્ર રશ્મિ બની,
લોકોનાં ચક્ષુએ ચમકારમાં,

વિચારવલોણે ચોથું રુપ દૂધનું!
માખણ બની પથરાય છે અર્કે,
ત્યારે માખણ ચોર આવે છે!?

પૈસા આપે નાના માણસો 
પ્રસાદ લઈ જાય મોટા માણસો!!!
ભગવાન ને કાબૂ માં રાખનારને પીછાણવો જ જોઈએ!!

કૃષ્ણમ વંદે જગદગુરુમ્ અને જય ગુરુદેવ દત્તાત્રેય
એક બાળક દિવ્યથી બોલાયું હતું " જય ગુરુદેવ "દૈત્ય"!!!
99% ભૂલ હોય શકે છે પણ મારી આંખો ચાર થઈ!!!

ભૂલકા ની ભુલ, ભુલકા ની ભૂલ
ભૂલકા ની ભૂલ, ભુલકા ની ભુલ
હ્રસ્વ ઉ અને મોટા ઊ ની રમત 
ઊંચી જ છે જોજો જૉ નું 
ભાષા જ્ઞાન ના હોય તો...?
1% નો વિશ્વાસ જ 100% હકારાત્મક પરિણામે!!!

શુક્રાચાર્ય ક્યારેય દેવ નથી બનાવી શકતા પણ શુકદેવજી જનક મહારાજ ને શિષ્ય પણ બની શકે છે... અને ભાગવત થકી પરીક્ષિત ને ભવ પર કરાવી શકે છે... અને જન્મે જય પણ જન્માવી શકે છે જેના યાજ્ઞવલક્ય સાથે ના સર્પ યજ્ઞથી માત્ર શેષ જ વાસુકી સાથે બાકી રહે છે!!

કૃષ્ણ ને મિત્ર ની ઉપમા જ આપી અર્જુન માટે
બેમત નથી એકજ મત છે કે આ દુનિયા રમત છે
જ્યાં ગુરુ શિષ્યના સગા સ્નેહી માટે રણે સારથિ બને છે!!!

પણ કૃષ્ણ ને ગુરુ કરતા મિત્ર શબ્દ વધુ શોભનીય અમુક વયે માની શકાય. મિર/મીર કે મિત/મીત ... મિત્ર નુ મીટર બાણ ની અણી એ??
આજે મારી આંગળીની મર્યાદાએ સાચે ઊંચી વાતે છે 
અને મન ને દોરે છે... કોઈ  'ક' ના નિધન બાદ જ બીજાના મહેલ બને છે.. બાકી ત્રીજો તો......... રંભા શોધે છે!!!

શ્યામ, કાળું સઘળે છે પણ વેદો માં તો સૂર્ય ને જ કાળો કહેલ ખેલ બતાવાયો, જોયો છે. હાલ માં તો સૂર્ય કલંકો ની.પણ વાત ઊંચી જ છે...મોટી લાઇટ સામે નાની લાઇટ બીજાની નજર માં કાળી જ મોટી લાઇટ સામે લાગશે...અખતરો કરવો હોય તો મોટા ટીવીના સફેદ સ્ક્રીન સાપેક્ષમાં મોબાઇલની જ સફેદ સ્ક્રીન લાઇટ ચકાસજો...

વાત સમજવા જેવી છે... 

મિત્ર શબ્દ નું પ્રાવધન અગ્નિપુરાણ એકાક્ષર કોષ અને માતૃકા સંધિ અનુસાર ઊંચું જ છે... એવું જ વય અને વયમ નું છે...

જય ગુરુદેવ દત્તાત્રેય
જય હિન્દ
જીગરમ જૈગિષ્ય જીગર:
જય ગુરુદેવ દત્તાત્રેય 
જય હિંદ 
જીગર ગૌરાંગભાઈ મહેતાના પ્રણામ 

Friday, August 23, 2024

खिलौने का बाजार

भारत का आर्थिक उन्नति विकास क्षैत्र "खिलौने"

खिलौने की जो बात निकाली ही है तो एक बात याद दिला दे कई साल पहले इंडियन एयरलाइन भी अपनी ऑफिस इसमें महाराज का खिलौना रखती थी और कई कस्टमर को वह गिफ्ट भी देती थी।

आज कई किस्म के छोटे बड़े खिलौने मिलते हैं, लेकिन खिलौने में कभी भी ब्रैंड या ब्रांड शब्द का नाम कोसों दूर है।

खिलौना क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम

“भारत में निर्मित खिलौनों की सफलता की कहानी” पर केस स्टडी के मुख्य बिंदु भारतीय खिलौना क्षेत्र को बढ़ावा देने की आगे की राह... यह बात चर्चा में क्यों छिपी रही उसके बजाय यहां ध्यान दे।

.... भारतीय खिलौना उद्योग ने 2014-15 की तुलना में 2022-23 में निर्यात में 239% की वृद्धि (और आयात में 52% की गिरावट) देखी।

भारत में खिलौना उद्योग का विकास:

एशिया के सफल औद्योगिक राष्ट्रों [जापान (एक शताब्दी पूर्व), चीन (1980 के दशक से) और वर्तमान में वियतनाम] ने रोजगार सृजन के लिए खिलौनों के निर्यात को बढ़ावा दिया। जिसके फल स्वरूप 1990 से 2000 की साल तक वीडियो गेम को कई बच्चों ने खेला और वह भी भारतीय 1500 से 10000 तक कीमत चुका कर!!! बादमे मोबाइल आ गए।

हालांकि, भारत में खिलौना विनिर्माण स्थिर, पुरातन और खंडित रहा, क्योंकि योजना-काल में अंतर्मुखी औद्योगिक नीति (आयात शुल्क और आरक्षण नीति) का पालन किया गया, जिससे घरेलू उत्पादन प्रभावित हुआ।
1990 के दशक में भारत में एल.पी.जी. सुधारों की शुरूआत के साथ, संगठित खिलौना विनिर्माण क्षेत्र में नए उद्यम आए और उत्पादकता वृद्धि में वृद्धि हुई।
प्रारंभिक उत्साहवर्धक संकेतों के बावजूद, उद्योग आरक्षण समाप्त करने से 2007-08 के बाद उत्पादन, निवेश और उत्पादकता विकास को बनाए रखने में असमर्थता रही। क्योंकि उस वक्त भारतीय खिलौना बाज़ार रूढ़ी गत परंपरा के आधीन था। अच्छी क्वालिटी वाली गाड़ी भी विदेश में मिलती थी, भारत में हवा की आवाजाही रहे ऐसे ठीक ठीक क्वालिटी की मिलती थी!!  यह सिर्फ उदाहरण है। उस वक्त सिविल इंजीनियर के लिए किमती खिलौने मिलते थे। 

मुझे मेरे पप्पा ने LEO की मशीन गन, इंडोर क्रिकेट किट, मैग्नेट का खिलौना, प्लास्टिक बॉल को स्विच करके पकड़ने वाला खिलौना, टकाटक टाइमर ट्रिंगल, ताश पत्ते, कैरम, चैस शतरंज, वॉलीबाल की भागीदारी जैसे कई आउट डोर रमत की सीख मेरे व्यक्तिगत विकास की नींव में डाली है।

भारत में जब आज खिलौने उद्योग की बात होती है तो हमारे पास की झोपड़ पट्टी वालो के सस्ते खिलौने भी याद आते है, जिससे गृहद्योग को भी बढ़ावा मिले ऐसा होता हे। आज लकड़ी महंगी हुई है, जिससे गृह उद्योग के छोटे धंधे पर उसका व्यापक असर हे। 

आएं कुछ अलग टिप्पणी भी देखे, जो 2000 की साल के बाद, 2024 में मोदी जी के भारत के समाचार जगत की सुर्खियों में व्याप्त है।

विकास से संबंधित आंकड़े:

2015-16 में, इस उद्योग में संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में लगभग 15,000 उद्यम थे, जो ₹1,688 करोड़ मूल्य के खिलौने बनाते थे और 35,000 श्रमिकों को रोजगार देते थे।

2000 और 2016 के बीच, नौकरी छूटने के कारण उद्योग का उत्पादन वास्तविक रूप से आधा रह गया तथा 2014-19 के बीच उद्योग में उत्पादकता में नकारात्मक वृद्धि देखी गई।

परिणामस्वरूप, आयात निर्यात की तुलना में लगभग तीन गुना बढ़ गया तथा घरेलू बिक्री में इसका योगदान 80% तक हो गया।

वैश्विक खिलौना व्यापार में भारत का नाम मुश्किल से ही आता है, तथा इसका निर्यात मात्र आधा प्रतिशत ही है।
भारतीय प्रधानमंत्री ने (अगस्त 2020 में अपने मन की बात संबोधन के दौरान) भारत को वैश्विक खिलौना विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की थी।

2018-19 और 2021-22 के बीच खिलौनों का निर्यात ₹812 करोड़ से बढ़कर ₹1,237 करोड़ हो गया और आयात ₹2,593 करोड़ से घटकर ₹819 करोड़ हो गया।

चुनौतियाँ: 

उद्योग की शुद्ध निर्यात को बनाए रखने की क्षमता सीमित है, क्योंकि इसने उत्पादन और निर्यात बढ़ाने के लिए न्यूनतम निवेश किया है। और क्वालिटी के हिसाब से विदेशी रोबोटिक मशीन से खिलौने फिनिशिंग से ज्यादा अच्छे लगते है। 

खिलौना क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदममें प्रथम तो मेक इन इंडिया पहल हे (2014)।

खिलौनों के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीटी) खिलौनों के डिजाइन को बढ़ावा देने, खिलौनों को शिक्षण संसाधन के रूप में उपयोग करने, खिलौनों की गुणवत्ता की निगरानी करने और स्वदेशी खिलौना समूहों को बढ़ावा देने के लिए है।

खिलौनों पर मूल सीमा शुल्क (2020 में 20% से 60% तक तीन गुना बढ़ाया गया)। विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने घटिया खिलौनों के आयात पर अंकुश लगाने के लिए प्रत्येक आयात खेप के नमूने की जांच अनिवार्य कर दी है। कई गैर-टैरिफ बाधाएं [खिलौनों के लिए गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) 2020 में जारी किया गया था] लगाई गईं।
एमएसएमई मंत्रालय पारंपरिक उद्योगों के पुनरुद्धार के लिए निधि योजना (एसएफयूआरटीआई) के तहत 19 खिलौना क्लस्टरों को समर्थन दे रहा है।

वस्त्र मंत्रालय 13 खिलौना क्लस्टरों को डिजाइनिंग और टूलींग सहायता प्रदान कर रहा है। स्वदेशी खिलौनों को बढ़ावा देने और नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए कई प्रचार पहल भी शुरू की गई हैं, जिनमें भारतीय खिलौना मेला 2021, टॉयकाथॉन आदि शामिल हैं।

“भारत में निर्मित खिलौनों की सफलता की कहानी” पर केस स्टडी के मुख्य बिंदु

यह केस स्टडी उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) के अनुरोध पर भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) लखनऊ द्वारा आयोजित की गई है। केन्द्र सरकार ने भारतीय खिलौना उद्योग के लिए अधिक अनुकूल विशिष्ठ निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को सक्षम बनाया है। 6 वर्षों (2014 से 2020) की अवधि में, इन समर्पित प्रयासों से विशिष्ठ निर्माण इकाइयों की संख्या दोगुनी हो गई है।

इससे आयातित इनपुट पर निर्भरता 33% से घटकर 12% रह गई, सकल बिक्री मूल्य में 10% CAGR की वृद्धि हुई तथा श्रम उत्पादकता में समग्र वृद्धि हुई।
वैश्विक खिलौना मूल्य श्रृंखला में देश के एकीकरण के साथ-साथ संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में घरेलू स्तर पर निर्मित खिलौनों के लिए शून्य शुल्क बाजार पहुंच के कारण भारत एक शीर्ष निर्यातक देश के रूप में उभर रहा है।

भारतीय खिलौना क्षेत्र को बढ़ावा देने की आगे की राह
भारत को विश्व के वर्तमान खिलौना केन्द्रों अर्थात् चीन और वियतनाम के लिए एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए खिलौना उद्योग और सरकार के बीच लगातार सहयोगात्मक प्रयास आवश्यक हैं।

प्रौद्योगिकी में प्रगति, ई-कॉमर्स को अपनाना, साझेदारी और निर्यात को प्रोत्साहित करना, ब्रांड निर्माण में निवेश, बच्चों के साथ संवाद करने के लिए शिक्षकों और अभिभावकों के साथ जुड़ना, सांस्कृतिक विविधता को महत्व देना और क्षेत्रीय कारीगरों के साथ सहयोग करना आदि।

आंकड़ों का कुछ रेफरेंस गूगल न्यूज से लिया है, लेकिन जो इंसान लारी या ठेला लगाके हाट पे बैठा होता हे, अगर उसे आप खिलौनों में ब्रांड की बात करोगे तो वह हस देगा। 

खिलौनों में भारतके 98% लोग ब्रांड से अंजान है। बच्चा भी us उम्र में ब्रांड से अंजान हो तो ही अच्छा होता है, एसी मेरी सोच हे।

बगैर ब्रांड के काग़ज़, प्लास्टिक, लकड़ी, धातु के कई खिलौने बच्चे हस्ते खेलते तोड़ देते है। माता पिता क्षमता में हो तो खिलौना टूटते ही हस्ते हे, वरना जापट देते है। 
कीमत देखें.. तकरीबन 6000!!!??? क्या भारत के मध्यम वर्गीय परिवार पहुंच सकेंगे?

एक पुरानी कहावत मशहूर है, पैसे वाले सेठ का गुस्सा, शहर की शेरी के कुत्ते पे या खिलोने पे पटावाले का बच्चा निकलता है!!!!!

कैसे?
सेठ का काम ना हो तो वह कार्यकर पर गुस्सा होगा,
कार्यकार अपने पटावले पर गुस्सा होगा।
पटावाला घरपे पत्नी पे गुस्सा होगा।
पत्नी कम पैसों के बजेट से महंगाई में अपने बच्चे पे गुस्सा होगी।
और बच्चा जो कुछ नही कर पाता, वह सड़क के कुत्ते पे गुस्सा होगा या खिलोने पे और उस पे अपने हाथों से कोहराम मचा देगा, शायद तोड़ भी दे, बच्चा हे, कुछ कहा नही जा सकता!!!



इस ब्लॉग में कई बात छोड़ी ही फिरभी प्रयास किया है बात को ध्यान से अच्छी क्वालिटी वाली खिलोने के धंधे को उजागर करने का। अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार की फिल्म एक सामाजिक वार्ता के तौर पे देखी थी वह अच्छी थी, जो खिलौने की फैक्ट्री के अनुसंधान में थी।

खुशामदीन 
जय हिंद 
जय गुरूदेव दत्तात्रेय 
जिगर गौरांगभाई महेता का सादर प्रणाम 

भंते

भंते ( पाली ) थेरवाद परंपरा में बौद्ध भिक्षुओं और वरिष्ठों को संबोधित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक सम्मानजनक शीर्षक है। धार्मिक शब...