नजाकत से बनी हुई फूल पत्ते की भात को सिर्फ मंदिरमे नहीं देखा जाता, वास्तविक क्षैत्र में वह ज्यादातर, बंदरोसे ही बिगड़ती है।
त्रिया राज और नाथ सम्प्रदाय की बात विशिष्ट ही है। जय पार्श्वनाथ तीर्थ अंकर।
क्रियान्वित शरीर और क्रियान्वित मन के सुभग समन्वय यानी अंतिम स्वरूप सिर्फ "शम" है।
पूजनीय दिवंगत श्री के का शास्त्री जी कुछ भी लिखते तो आखिरमे "इति शम" जरूर लिखते थे।
इसी लिए तीनो मुख्य अग्नि को पता रहता है की मित्रवरूण क्या है।
"इति शम वरुणो" भी वेदों में ही नहीं अनेक यज्ञ स्थान में, पूजन में मंत्र उच्चारण में भी निहित सम्मिलित है।
दिवंगत चंद्रकांत बक्षी जी ने फारसी को जितना जाना, उसमे ढूंढा या जाना और लिखा भी की, "औरत" यानी स्त्री नही, बल्के स्त्री का महत्तम ढका हुआ विभाग, जहां सबकी यानी ईशा वास्यम का जो श्लोक का मर्मार्थ है की, "औ" में से "ओ" अलग हो तो भी, "औ" को कोई फेर नही पड़ता।
वही औ सदा रत यानी क्रियान्वित रहता ही है, जिसे सबकी निगाह से काम रत रखा वह प्र द्यु मन/म्न रहती है।
तो स्त्री को बचाने के लिए, अच्छे तत्त्व के संवर्धन के लिए सब्र से शब्द आया "औरत का बुर्का / बुर्खा", जो वेदों की "कं" और "खं" ब्रह्म की तवज्जू को सराहनीय तौर से अलग तासिर से बात जोड़ी हुई प्रभु, अल्लाह, गोड ने स्त्री सम्मान के लिए बनाई है।
Today's note, specially for E DHRAA.. E DHRAA
Radhe Radhe!!!
राधा राधा यानी अ ध्रा, अ ध्रा के जैसे, ध्रा यानी श्वास।
Few sentences needs comma, semicolon, hyphen etcetera ..Example...
ચિંતા ના કરતા.
ચિંતા, નાક રત આ.
And even more they're not સ્વર કે વ્યંજન!!!!
यजुर्वेदस्य चत्वारिंशोध्याय
अंतिम श्लोकस्य शब्दम . . .
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
यो सावादित्ये पुरुषः सो सावहम ॥
ओ म्खं ब्रह्म ॥
Jay Gurudev Dattatreya
Happy moments
Jay Hind
जय हिंद
जय गुरुदेव दत्तात्रेय
जिगर गौरांगभाई महेता का सबको सादर प्रणाम
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