Saturday, December 31, 2022

सत्यवान सावित्री की रजुआत यानी पेशकश

राजा अश्वपति निस्सन्तान थे। उन्होंने देवी की उपासना की, जिसके कारण देवी ने प्रसन्न होकर वरदान के रूप में एक कन्या को दिया। राजा ने उस लड़की का नाम सावित्री रखा। जब सावित्री जवान हो गई तो राजा को उसकी शादी की चिन्ता होने लगी। राजा सावित्री के लिए योग्य वर की खोज में काफी घूमते हैं, लेकिन कहीं भी उन्हें इस लड़की के योग्य वर नहीं मिला। 

अन्त में सावित्री स्वयं ही अपने लिए वर ढूँढने के लिए निकलती है। वह अपने मन ही मन में विचार करती हुई भगवान से प्रार्थना करती है कि हे भगवान्, मेरे योग्य वर से मुझे शीघ्र मिलाओ । मुझे ऐसे वर की तलाश है जो सुन्दर, ईमानदार तथा मुझसे हँस-हँसकर प्रेम करने वाला हो, भले ही वह गरीब ही क्यों न हो। 

सावित्री चलते-चलते एक जंगल में पहुँचती है। वहाँ उसे एक आदमी लकड़ी काटता हुआ मिलता है। वह उसका परिचय पूछती है। उसका नाम सत्यवान था। सत्यवाने उदास होकर खड़ा रहता है। सावित्री कहती है कि जब कोई प्रेम से बात करना चाहे तो उससे बात करनी चाहिए। 

सत्यवान जवाब देता है कि मैं एक गरीब आदमी हूँ। यहाँ जंगल में लकड़ियाँ काटकर गुजारा करता हूँ। मेरा यह शरीर चिन्ताओं ने सूखा दिया है मैं कभी राज सिंहासन का अधिकारी था, लेकिन दुर्भाग्यवश आज मैं लकड़ियाँ काटकर गुजारा करता हूँ। 

सावित्री सत्यवान को अपने साथ अपने घर ले जाती है। वह अपने परिजनों से बताती है कि मैंने सत्यवान को अपने पति रूप में चुन लिया है। उसकी माँ उसे समझाती है कि तुझे सुख-सुविधाओं की आदत है, फिर इस गरीब व्यक्ति के साथ तुम्हें सदैव दुःख भोगने पड़ेंगे, लेकिन सावित्री ने तो सत्यवान को ही पति बनाने का संकल्प ले लिया था। 

जब नारद जी को इस बात का पता चलता है तो वे सावित्री को समझाते हैं कि सत्यवान की आयु बहुत कम है, यह तो थोड़े दिनों में ही मरने वाला है। सावित्री कहती है कि मैंने सत्यवान को अपना पति मान लिया है. चाहे इसकी आयु थोड़ी ही क्यों न हो। 

अब सावित्री सत्यवान के साथ चल देती है। सत्यवान के माता-पिता अन्ध थे। उसका पिता दुमतसेन शालिन देश का राजा हुआ करता था उनका राजपाट दूसरे राजा छीन लेते हैं। अब वे जंगल में एक कुटिया में रहने लगते हैं। सत्यवान लकड़ियाँ बेचकर अपना गुजारा चलाता है। वह सावित्री को समझाता है कि यहाँ जंगल में बहुत दुःख उठाने पड़ते हैं। मेरे साथ तुम कभी भी सुखी नहीं रह सकती हो। तुम्हें इस जंगल में रो-रोकर अपना जीवन व्यतीत करना पड़ेगा। तुम एक राजा की लड़की हो इसलिए किसी राजा के साथ ही विवाह करो। इतना समझाने पर भी सावित्री अपने पति को छोड़ती नही, और साथ ही रहती हे।

नारद आए और सावित्री से कहने लगे की तुम्हारा पति अल्पायु है। आप कोई दूसरा वर मांग लें। पर सावित्री ने कहा- मैं एक हिन्दू नारी हूं, पति को एक ही बार चुनती हूं। इसी समय सत्यवान के सिर में अत्यधिक पीड़ा होने लगी।

सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में पति के सिर को रख उसे लेटा दिया। उसी समय सावित्री ने देखा अनेक यमदूतों के साथ यमराज आ पहुंचे है। सत्यवान के जीव को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं। यह देख सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं।

उन्हें आता देख यमराज ने कहा कि- हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है। अब तुम वापस लौट जाओ। उनकी इस बात पर सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे मुझे उनके साथ रहना है। यही मेरा पत्नी धर्म है।सावित्री के मुख से यह उत्तर सुन कर यमराज बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सावित्री को वर मांगने को कहा और बोले- मैं तुम्हें तीन वर देता हूं। बोलो तुम कौन-कौन से तीन वर लोगी।

तब सावित्री ने सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी, ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा एवं अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा। सावित्री के यह तीनों वरदान सुनने के बाद यमराज ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा- तथास्तु! ऐसा ही होगा।‍सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास लौट आई। जहां सत्यवान मृत पड़ा था। सत्यवान के मृत शरीर में फिर से संचार हुआ। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास-ससुर को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया।





भागवत नए जरत्कारु ऋषि की बात है। वैदिक भाषा खूब गहन हे। 

जय गुरुदेव दत्तात्रेय
जय हिंद 

No comments:

Post a Comment

भंते

भंते ( पाली ) थेरवाद परंपरा में बौद्ध भिक्षुओं और वरिष्ठों को संबोधित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक सम्मानजनक शीर्षक है। धार्मिक शब...