भगवान सुब्रमण्यम जिन्हें उत्तर भारतीय गाथाओं में श्री कार्तिकेय जी भी कहा जाता है, उन्हें दक्षिण भारत मे भगवान मुरुगन या मुरुगा भी कहते है।
वैसे तो उत्तर भारतीय परमपराओं में कहा जाता है कि भगवान कार्तिकेय जी ने कभी न विवाह करने की शपथ ली थी और वह ब्रह्मचारी है। लेकिन दक्षिण भारतीय परंपराओं में उनके विवाह की कथा मिलती है।
कहते है कि उनका विवाह वल्ली कुरूव और देवसेना नामक दो कन्याओं से हुआ था, जिसमे से वल्ली कुरुवर काबिले के एक सरदार की कन्या थी, जिसे मुरुगन भगवान के प्रति बहुत आस्था थी , मुरुगन ने उसकी आस्था की परीक्षा ली और उत्तीर्ण होने पर उनसे विवाह का वादा किया लेकिन उनके पिता को पहले इस रिश्ते से एतराज था जिसकी वजह से उन्होंने मुरुगन जी से युद्ध किया और जब वह सरदार युद्ध मे हार गए तो उन्होंने मुरुगन जी को पहचान कर वल्ली का विवाह उनसे कर दिया।
देवसेना जो कि दक्ष प्रजापति की कन्या और देवराज इंद्र की गोद ली हुई पुत्री है उसके पाणिग्रहण के लिए देव कार्तिकेय से कहा गया था और इस प्रकार वह भी उनकी पत्नी है।
" पाणी ग्रहण " या " पाणिग्रहण "
भेदी संस्कृत शब्द हे और शादी की बात में शालीन तोर से बोलेजाने वाली भाषा का शब्द प्रयोग है।
ण का मतलब देवनागरी लिपि में खूब सांकेतिक रूप से स्त्री पुरुष हे। जैसे की दिया और खड़ी और आड़ी बाती।
दीर्घ ई यानी की बहुत बड़ी इच्छा को रखा जाना।
ह्रस्व इ यानी छोटी इच्छा को रखा जाना।
अ यानी देव या स्वर।
प यानी पंच महाभूत स्वरूप शरीर या ईर।
अ कार रूप देवतत्वों वाले गुण के साथ जुड़े हुए पंच तत्वों को एक साथ नए स्त्री पुरुष के साथ जुड़ना।
गर्भ संस्कार की बात है।
संस्कृत भेद से जुड़ना हो तो जगद गुरु शंकरा आचार्य की बात मानो।
अर्थ स्वयं अनर्थ है।
जय गुरुदेव दत्तात्रेय
जय हिंद
Jigaram JAIGISHYA is jigar:
Jigar Gaurangbhai Mehta
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