संस्कृत शब्द था "वत" छोटे भाई का और "अत" था बड़े भाई का। लेकिन दोनों की आंख अलग नहीं देखी।
संक्षेप में भागवत, श्रीवत, अवत और गुजराती शब्द था वती यानी उसकी जगह पे, उसके बदले। आंग्ल भाषा में उसे proxy कहते हे।
भागवत से भगवती यानी
जो कर्म फल अर्क मनुष्य के सुषुप्त कर्मका छूटा पड़ा हुआ हे, जो सत प्रकृति वाला है, उसकी भी जिजीविषा को संतृप्त मनुष्य जन्म लेने की होती हे। लेकिन संचित कर्म फल से 84 लाख योनि के बाद ही अच्छे कर्म से ही मनूष्यावतार मिलता हे। या किसके जन्म को साकार करने में फूल की पंखुड़ी की जितना योगदान करना हे ऐसे समझने की बात हे।
भग यानी अग्नि वाला ग कार।
अहवनीय अग्नि हर जगह हे, ग्रह्यपत्य ढूंढते ही कही पे जन्म लेना हे।
आवृत्त का छूटा हो कर रहना यानी "वत"।
जो छूटा हुआ पृथ्वी पे ही हे उसे किसीसे भी दिखाई देना यानी "अत"।
अ + वत+ अर = अवतार यानी अव + तार यानी उलटे को सीधा करना अलग करने के बाद।
बादमें सुरील की पुत्री का नाम केरवी (KRV) रखा और कृणाल की पुत्री का नाम मोहिता (कहीं कहीं पे ह को स या र भी बोलते हे {मोरिता})रखा गया।
आई याई यो करू में क्या सुकु सुकू।
मुझे बूढ़े झोली वाले बलवंत जी की मेरे साथ घर पे हुई घटना याद आई ।
जय गुरुदेव दत्तात्रेय
जय हिंद
जिगरम जैगिष्य जिगर:
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