जब मुझे विश्वामित्र और उसके पुत्र शून: शेप के बारे में पता चला तो उसके एक वाक्य ने मुझे जिंजोड के रखा। जिसमे उसने अग्नि को मित्र बताया हुआ है।
मेरे लिए मित्रावरूण के बाद यह बात मित्राग्न गण की नाविन्यप्रद रही। पहले लिखा था गूगल रिफरेंस से लेकिन जब आज योगिराज को पढ़ा, उसकी 20 जुलाई 2020 की पोस्ट देखा तो दोबारा पूरे परिवार की माहिती छाप दी। मेरे अच्छे समय में साथ देने वाले मरूत को प्रणाम।
यह लिखते वक्त आई हुई बदबूदार खुशबू को भी प्रणाम।
मित्राग्न इस लिए कहा क्योंकि अग्नि की इच्छा हमेशा खानेकी, आरोहण की, भक्षण की, अत को उर से उत से ऊत बनाने की होती है। हमे अपनी इच्छा पर काबू होना चाहिए जिससे अरुण को रास्ता मिले।
अग्नेस्तु मारुतो नाम गर्भाधाने विधीयते।
पुंसवने चन्द्रनामा शुगांकर्मणि शोभन:।।
सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्भो जातकर्मणि।
नाग्नि स्यात्पार्थिवी ह्यग्नि: प्राशने च शुचिस्तथा।।
सत्यनामाथ चूडायां व्रतादेशे समुद्भव:।
गोदाने सूर्यनामा च केशान्ते ह्यग्निरुच्यते।।
वैश्वानरो विसर्गे तु विवाहे योजक: स्मृत:।
चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथा परे।।
प्रायश्चित्ते विधुश्चैव पाकयज्ञे तु साहस:।
लक्षहोमे तु वह्नि:स्यात कोटिहोमे हुताश्न:।।
पूर्णाहुत्यां मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा।
पौष्टिके बलदश्चैव क्रोधाग्निश्चाभिचारिके।।
वश्यर्थे शमनी नाम वरदानेऽभिदूषक:।
कोष्ठे तु जठरी नाम क्रव्यादो मृतभक्षणे।।
01 गर्भाधान में अग्नि को "मारुत" कहते हैं।
02 पुंसवन में "चन्द्रमा
03 शुगांकर्म में "शोभन
04 सीमान्त में "मंगल
05 जातकर्म में 'प्रगल्भ
06 नामकरण में "पार्थिव
07 अन्नप्राशन में 'शुचि
08 चूड़ाकर्म में "सत्य
09 व्रतबन्ध (उपनयन) में "समुद्भव
10 गोदान में "सूर्य
11 केशान्त (समावर्तन) में "अग्नि
12 विसर्ग (अर्थात् अग्निहोत्रादिक्रियाकलाप) में "वैश्वानर
13 विवाह में "योजक
14 चतुर्थी में "शिखी
15 धृति में "अग्नि
16 प्रायश्चित यानी प्रायश्चित्तात्मक महाव्याहृतिहोम में "विधु
17 पाकयज्ञ यानी पाकांग होम, वृषोत्सर्ग, गृहप्रतिष्ठा आदि में 'साहस
18 लक्षहोम में "वह्नि
19 कोटि होम में "हुताशन
20 पूर्णाहुति में "मृड
21 शान्ति में "वरद
22 पौष्टिक में "बलद
23 आभिचारिक में "क्रोधाग्नि
24 वशीकरण में "शमन
25 वरदान में "अभिदूषक
26 कोष्ठ में "जठर
27 मृत भक्षण में "क्रव्याद" कहा गया है।
यज्ञादि कर्मों में अग्नि के नाम एवं वेदों में अग्नि की महत्ताअपने नाक कार्य कर्म की मातृका प्रमाण से है।
अग्नि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पौराणिक गाथा इस प्रकार है-
प्रथम धर्म की वसु नामक पत्नी से अग्नि उत्पन्न हुआ। यहां तीन नाम है। उसकी पत्नी स्वाहा (4) से उसके तीन पुत्र हुए- जो मिलाकर कुल सात (7) नाम हुए।
पावक
पवमान
शुचि
27 + 7 = 34
व्योम से सूर्य
अन्तरिक्ष (मध्याकाश) में विद्युत
पृथ्वी पर साधारण अग्नि
34 एड with 3 total 37
जैमिनी ने मीमांसासूत्र के "हवि:प्रक्षेपणाधिकरण" में अग्नि के छ: प्रकार बताये हैं-
गार्हपत्य
आहवनीय
दक्षिणाग्नि
सभ्य
आवसथ्य
औपासन
37 + 6 = 43 (कुल)
अग्नि का ज्ञान सर्वव्यापी है और वह उत्पन्न होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है। इसलिए वह 'जातवेदा:' (44) के नाम से विख्यात है। अग्नि कभी द्यावापृथिवी का पुत्र (45) और कभी द्यौ: का सूनु (पुत्र) (46) कहा गया है। उसके तीन जन्मों का वर्णन वेदों में मिलता है। जिनके स्थान हैं-स्वर्ग, पृथ्वी तथा जल। स्वर्ग, वायु तथा पृथ्वी अग्नि के तीन सिर, तीन जीभ तथा तीन स्थानों का बहुत निर्देश वेद में उपलब्ध होता है।
अग्नि का पूजन भारतीय संस्कृति का प्रमुख चिह्न है और वह गृहदेवता के रूप में उपासना और पूजा का एक प्रधान विषय है। इसलिए अग्नि 'गृहा', 'गृहपति' (घर का स्वामी) तथा 'विश्वपति' (जन का रक्षक) कहलाता है।
46 + 3 = 49
छठे मन्वन्तर में वसु की वसुधारा नामक पत्नी से द्रविणक आदि पुत्र हुए, जिनमें 45 अग्नि-संतान उत्पन्न हुए। इस प्रकार सब मिलाकर 49 अग्नि हैं। विभिन्न कर्मों में अग्नि के भिन्न-भिन्न नाम हैं। लौकिक कर्म में अग्नि का प्रथम नाम पावक है। गृहप्रवेश आदि में निम्नांकित अन्य नाम प्रसिद्ध हैं।
रूप का वर्णन
अग्नि के रूप का वर्णन इस प्रकार है-
पिंगभ्रूश्मश्रुकेशाक्ष: पीनांगजठरोऽरुण:।
छागस्थ: साक्षसूत्रोऽग्नि: सप्तार्चि: शक्तिधारक:।।
भौहें, दाढ़ी, केश और आँखें पीली हैं। अंग स्थूल हैं और उदर लाल है। बकरे पर आरूढ़ हैं, अक्षमाला लिये है। इसकी सात ज्वालाएँ हैं और शक्ति को धारण करता है।
शुभ लक्षण
होम योग्य अग्नि के शुभ लक्षण निम्नांकित हैं-
अर्चिष्मान् पिण्डितशिख: सर्पि:काञ्चनसन्निभ:।
स्निग्ध: प्रदक्षिणश्चैव वह्नि: स्यात् कार्यसिद्धये।।
ज्वालायुक्त, पिण्डितशिख, घी एवं सुवर्ण के समान, चिकना और दाहिनी ओर गतिशील अग्नि सिद्धिदायक होता है।
शब्द उत्पादन
देहजन्य अग्नि में शब्द उत्पादन की शक्ति होती है, जैसा कि "संगीतदर्पण" में कहा है-
आत्मना प्रेरितं चित्तं वह्निमाहन्ति देहजम्।
ब्रह्मग्रन्थिस्थितं प्राणं स प्रेरयति पावक:।।
पावकप्रेरित: सोऽथ क्रमदूर्ध्वपथे चरन्।
अतिसूक्ष्मध्वनि नाभौ हृदि सूक्ष्मं गले पुन:।।
पुष्टं शीर्षे त्वपुष्टञ्च कृत्रिमं वदने तथा।
आविर्भावयतीत्येवं पञ्चधा कीर्त्यते बुधै:।।
नकारं प्राणनामानं दकारमनलं विंदु:।
जात: प्राणाग्निसंयोगात्तेन नादोऽभिधीयते।।
आत्मा के द्वारा प्रेरित चित्त देह में उत्पन्न अग्नि को आहत करता है। ब्रह्मग्रन्थि में स्थित प्रेरित वह प्राण क्रम से ऊपर चलता हुआ नाभि में अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि करता है तथा गले और हृदय में भी सूक्ष्म ध्वनि करता है। सिर में पुष्ट और अपुष्ट तथा मुख में कृत्रिम प्रकाश करता है। विद्वानों ने पाँच प्रकार का अग्नि बताया है। नकार प्राण का नाम है, दकार अग्नि का नाम है। प्राण और अग्नि के संयोग से नाद की उत्पत्ति होती है। सब देवताओं में इसका प्रथम आराध्यत्व ऋग्वेद के सर्वप्रथम मंत्र "अग्निमीले पुरोहितम्" से प्रकट होता है।
रूप का प्रयोग
योगाग्नि अथवा ज्ञानाग्नि के रूप में भी "अग्नि" का प्रयोग होता है। गीता में यह कथन है-
'ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।'
'ज्ञानाग्निदग्धकर्माणि तमाहु: पण्डितं बुधा:।।'
अग्नि का सर्वप्रथम स्थान
पृथ्वी-स्थानीय देवों में अग्नि का सर्वप्रथम स्थान है। अग्नि यज्ञीय अग्नि का प्रतिनिधि रूप है। यज्ञ के द्वारा मनुष्य का सम्बन्ध देवों से होता है। अत: यज्ञ की अग्नि मनुष्य और देवता के बीच सम्बन्ध का सूचक है। परन्तु अग्नि का स्वरूप भौतिक भी है। इनका स्वरूप गरजते हुए वृषभ के समान बतलाया गया है। उन्हें सिर और पैर नहीं हैं परन्तु जिह्वा लाल है। वैदिक मंत्रों में बतलाया गया है कि उत्पत्ति के समय अग्नि का स्वरूप बछड़े के समान है, परन्तु प्रज्वलित होने पर उनका स्वरूप अश्व के समान है। उनकी ज्वाला को विद्युत के समान कहा गया है। काष्ठ और घृत को उनका भोजन माना गया है। अग्नि धूम पताके के समान ऊपर की ओर जाता है। इसी कारण से अग्नि को धूमकेतु कहा गया है। यज्ञ के समय इनका आह्वान किया जाता है कि ये कुश के आसन पर विराजमान हों तथा देवों के हविष को ग्रहण करें। अग्नि का जन्म स्थान स्वर्ग माना गया है। स्वर्ग से मातरिश्वा ने धरती पर इन्हें लाया। अग्नि ज्ञान का प्रतीक है। वह सभी प्राणियों के ज्ञाता देव हैं। अत: इन्हें 'जातवेदा:' कहा गया है। अग्नि को द्युस्थानीय देवता सूर्य भी माना गया है। अग्नि को 'त्रिविध' तथा 'द्विजन्मा' भी कहा गया है। उनका प्रथम जन्म स्वर्ग में तथा दूसरा जन्म जल में (पृथ्वी पर) गया है। अग्नि दानवों के भक्षक तथा मानवों के रक्षक माने गए हैं। इनका वर्णन दो सौ वैदिक सूक्तों में प्राप्त होता है।
आभार योगिराज की फेसबुक की 20 जुलाई 2020 की पोस्ट को।
जय गुरुदेव दत्तात्रेय
जय हिंद
जिगरम जैगीष्य जिगर:
वायुपुराण के तहत अग्नि परिवार की माहिती। यहां 49 की गिनती पूरी नही होती थी जो आज होगई।
Details above mentioned on based on yagna yaag matter and mention Below is my old post based on vayu Puran... details... There are dhishny names whichever are purely find by us on circumstances... Every Mattel has unique colours types flames...
लेकिन अग्र स्थानीय अग्नि को सादर प्रणाम।
वायु पुराण के तहत अग्नि के विशिष्ठ नाम कुछ इस प्रकार हे।
अग्नि + स्वाहा = पावक
विद्युत + अवभ्रुथ = सहरक्ष्य पवमान
निर्मांथ्य + ग्राह्यपत्य = क्रव्यवाहन
शुचि + सौर = हव्यवाहन
Total 12
01 ब्रह्मोदनाग्नि जिसे भरत भी कहते हैं।
... वैश्वानरमुख } मह } काव्य } जलरस(अमृत)
टोकुल 05
लौकिकाग्नि अथर्वा } दद्ध्यड
(भृगु पुत्र अंगिरा भी कहते है।) Total 3
ग्रह्यापत्य के दो पुत्र जिसमे
शंस्य और आवहनीय
शंस्य एक और उसके पुत्रादि...
शंस्य के दो पुत्र सभ्य और अवस्थ्य
और शंस्य की 16 नदी के साथ शादी हुई।
जो कावेरी, कृष्णवेणी, नर्मदा, यमुना, गोदावरी, वितस्ता, चंद्रभागा, इरावती, विपाशा, कौशिकी, शतद्रु, सरयू, सीता, सरस्वती, ह्लादिनी, पावनी नामसे जानी जाती है।
शंस्य से 16 प्रकारकी धिष्ण्याः उतपन्न हुई। जिसे 16 धीषणी कहते हैं।
दूसरा आह्वनिय को अभिमानी कहते है और वही हव्यवाहन के रूपसे दो पुत्र प्रणयन और शुक्र का पिता है।
...पवमान या के पुत्रदि...
जिसमे विहरणीय, और उपस्थेय मुख्य है।
उपस्थेय को शालामुखकीय लहते है।
ऋतु, प्रवाहण, अग्नीध्र भी है।
अनिर्देश्य और वाच्य भी है।
दूसरे उत्तरवैदिक अग्नि को सम्राट नामक पुत्र है।
पार्षदन्य अग्नि भी है।
प्रतद्वोच में नभ नामक अग्नि है।
वसु नाम से ब्रह्मज्योति अग्नि है।
शामित्र में हव्यसूर्य नामके अग्निको असंसृष्ट अग्नि कहते है।
विश्व का समुद्र नामक अग्नि है।
अति प्रकाशित ऋतुधामा अग्नि भी है। जो औदुम्बर वृक्षमे है।
अहिर्बुधन्य नामसे अनुदेश्य अग्नि भी है, जिसे गृहपति कहते है।
विहरणीय के आठ पुत्र कहे है जो वर्णन किया है।
पौत्रेय नामक हव्य का वहन करता हुआ अग्नि भी है।
शांति नामक अग्नि प्रचेता है। वही सत्य है।
विश्वदेव अग्नि भी ब्रह्म स्थान में है।
अवक्षुरच्छाक नामक अग्नि आकाश में है।
पराक्रमी उशीर नामक अग्नि नैष्ठीय है।
व्यरत्ति नामक मार्जालीय अग्नि है।
सौम्य भी धीषणी पुत्र अग्नि है।
पावक पुत्र ह्रच्छय जठराग्नि है। उसका पुत्र मन्यूमान है।
मन्यूमान } संवर्तकाग्नि जो वडवा नामक झषाणाम के मुख में होता है।
उसके पुत्र को सहरक्ष भी कहते है।
सहरक्ष का पुत्र क्षाम, जो सजीव के घर को जलाता है।
"क्षाम का पुत्र क्रव्याद, जो मृत्यु पर्यन्त सजीव का भक्षण करता है। यज्ञ याग में, इष्ट प्रवृत्ति में क्रव्याद को याद करके नैरुत्य दिशामे उसको स्थान देते है जिससे यज्ञ जिस इच्छा से हुआ है वह परिपूर्ण हो।"
शुचि का आयु नामक पुत्र है।
आयु से महिमान, से शावान, से सवन, से अद्भुत, से विविच, से अर्क, महान नाम वाले अग्नि पुत्र है।
सवन जो पाकयग्नो के अभिमानी है। वैसेही विविच प्रायश्चित वाले याग्निक का होमात्मक द्रव्य का भक्षण करता है।
अर्क के पुत्र का नाम इस तरह है। अनिकवान, वासृजवान, रक्षोहा, पितृकृत, सुरभि, द्रव्यरत्न, रुक्मांगद या रुकमान।
जैसे शंस्य कि 16 पत्नी है वैसे शुचि के 14 अग्नि को उसकी प्रजा कही है।
जय गुरुदेव दत्तात्रेय
जय हिंद
जिगर महेता / जैगीष्य
Every time on circumstances the name made by that time so called achaarya and needed energy based frequency structure which is mentioned in Agni Puran as per the Agni Puran ekaakshar kosh sanrachna chapter, that's why so many different names are finding by us in different shloka and Puran...
ऊष्म वायुमये संध्यास्या दिव्य च दैदिप्यान शांत तृतीयातिथि स्या सोमक शशांकिय मुद्राये।
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